शरद पूर्णिमा- औषधीय चांदनी की रात्रि

मृत्युंजय दीक्षित
आश्विन मास की पूर्णिमा का दिन शरद पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। ज्योतिष के अनुसार पूरे वर्ष में केवल इसी दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। कुछ क्षेत्रों में इस पर्व को कौमुदी पर्व भी कहते हैं। इसी दिन श्रीकृष्ण ने महारास रचाया था। इस रात्रि को चंद्रमा की किरणों से अमृत के समान प्रभावकारी होती हैं इसलिए इस दिन खीर बनाकर रात भर चांदनी में रख कर अगले दिन खाने का विधान है।
माहात्म्य- इस दिन कोई व्यक्ति यदि कोई अनुष्ठान करता है तो उसका अनुष्ठान अवश्य सफल होता है। इस दिन व्रत कर तीसरे पहर हाथियों की आरती करने पर उत्तम फल मिलते हैं। पूर्णिमाओं में आश्विन मास की पूर्णिमा सर्वश्रेष्ठ मानी गयी है। इस पूर्णिमा को आरोग्य हेतु फलदायक माना जाता है। मान्यता के अनुसार पूर्ण चंद्रमा अमृत का स्रोत है अतः माना जाता है कि इस पूर्णिमा को चंद्रमा से अमृत की वर्षा होती है। शरद पूर्णिमा की रात्रि के समय खीर को चंद्रमा की किरणों में रखकर उसे प्रसाद स्वरूप ग्रहण किया जाता है। चंद्रमा की किरणों से अमृत वर्षा भोजन में समाहित हो जाती है जिसका सेवन करने से कई व्यसीधियां दूर हो जाती हैं। आयुर्वेद के ग्रंथों में भी चांदनी के औषधीय गुणों के महत्व का वर्णन मिलता है।
पूजन विधि -विधान – इस दिन प्रातः काल स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर अपने आराध्य अथवा कुल देवता की षोडषोपचार से पूजा अर्चना एवं भगवान शंकर के पुत्र कार्तिकेय की पूजा करने का विधान है। एक पाटे पर जल से भरा लोटा और गेहूं से भरा एक गिलास रखकर उस पर रोली से स्वास्तिक बनाकर चावल और दक्षिणा चढ़ाएं। टीका लगाकर हाथ में गेंहू के 13 दाने लेकर कथा सुनें। गेहूं भरा गिलास और रूपया कथा कहने वाली स्त्री को पैर छूकर दें । लोटे के जल से रात को चंद्रमा को अर्घ्य दें। इसके बाद ही भोजन करना चाहिये। मंदिर में खरी आदि दान करने का भी विधान है। कोई भी एक ऋतु भी खीर के साथ चांदनी में रखा जाता है। रात्रि में जागरण करके भजन कीर्तन करने का भी विधान है।
रोगियों के लिये वरदान है शरद पूर्णिमा की रात – एक अध्ययन के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन औषधियों की स्पंदन क्षमता अधिक होती है। रसाकर्षण के कारण जब अंदर का पदार्थ सांद्र होने लगता है तब रिक्तिकाओं से विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है। लंकाधिपति रावण शरद पूर्णिमा की रात किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि पर ग्रहण करता था। चांदनी रात में 10 से 12 बजे तक कम वस़्त्रों में घूमने वाले लोगों को ऊर्जा प्राप्त होती है। सोमचक्र, नक्षत्रीय चक्र और आश्विन के त्रिकोण के कारण शरद ऋतु से ऊर्जा का संग्रह होता है और बसंत में निग्रह होता है। शोध के अनुसार खीर को चांदी के पात्र में बनाना चाहिये । चांदी में प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। इससे विषाणु दूर रहते हैं। हल्दी का उपयोग निषिद्ध है। प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 30 मिनट तक शरद पूर्णिमा का चांदनी स्नान करना चाहिये।





