धर्म-आस्था

गरबा के बीच में क्यों रखा जाता है दीपक वाला घड़ा? जानें इसके पीछे की मान्यता

भारतीय संस्कृति में नृत्य और संगीत को ईश्वर तक पहुंचने का सबसे सरल मार्ग माना गया है। नवरात्रि के दौरान खेला जाने वाला गरबा इसी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा का अद्भुत उदाहरण हैं। गरबा केवल गुजरात की सांस्कृतिक पहचान नहीं बल्कि आज पूरे विश्व में शक्ति-उपासना का पर्याय बन चुका है।

गोल घेरे में घूमकर किया जाने वाला यह नृत्य इस बात का प्रतीक है कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड चलायमान है और मां दुर्गा ही इसका केंद्र हैं। नवरात्रि के नौ दिनों में गरबा नृत्य के माध्यम से श्रद्धालु अपनी ऊर्जा और भक्ति को मां के चरणों में अर्पित करते हैं। आइए समझते हैं कि नवरात्रि में गरबा नृत्य का धार्मिक महत्व, सांस्कृतिक धरोहर और इसके पीछे छिपी पौराणिक मान्यताएं क्या हैं।

संस्कृत शब्द ‘गर्भ’ से ‘गरबा’ बना है, जिसका अर्थ गर्भाशय या सृजन होता है। गोल घेरा हिंदू धर्म में जन्म, जीवन, मृत्यु और पुनः जन्म के अनंत चक्र का प्रतीक माना जाता है। गरबा के केंद्र में एक छेद वाला मिट्टी का घड़ा (जिसे ‘गरबो’ कहते हैं) रखा जाता है, जिसके अंदर जलता हुआ दीपक (गर्भ दीप) होता है।

यह दीपक जीवन की ऊर्जा और मां दुर्गा की शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जिसके चारों ओर घूमकर लोग नृत्य करते हैं और देवी मां के प्रति अपनी श्रद्धा और आराधना को दर्शाते हैं। गरबा करने के दौरान व्यक्ति किसी भी समूह में जुड़ सकता है या बाहर आ सकता है। यह समाज में भेदभाव की भावना को दूर कर भाईचारा, एकता और सामूहिक ऊर्जा को बढ़ावा देता है।

गोल-गोल घूमने से शरीर में एक लय और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। पारंपरिक रूप से इसे बिना जूतों-चप्पलों के (नंगे पैर) किया जाता है, जिससे शरीर धरती की ऊर्जा से सीधे जुड़ता है। गरबा केवल एक नृत्य नहीं बल्कि मां शक्ति की आराधना और भक्ति का रूप है। इसलिए इसे मंदिर या पूजा स्थल की तरह पवित्र मानकर नंगे पैर किया जाता है। सनातन परंपरा में जूते-चप्पल को सांसारिकता और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इन्हें उतारकर नृत्य करना समर्पण और विनम्रता को दर्शाता है।

गरबा करने के दौरान तीन तालियां बजाई जाती हैं, जो ब्रह्मा (इच्छा शक्ति), विष्णु (कार्य शक्ति) और शिव (ज्ञान शक्ति) के तीनों स्वरूपों और मां अंबा की जागृति का प्रतीक मानी जाती है। नवरात्रि में गरबा के साथ डांडिया भी खेला जाता है, जिसमें इस्तेमाल होने वाली छड़ियां (डंडे) मां दुर्गा की तलवार का प्रतीक हैं जो बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाती हैं।

यह नृत्य मूल रूप से गुजरात से संबंधित है, जिसे अब पूरे भारत और दुनियाभर में उत्साह के साथ मनाया जाता है। दिसंबर 2023 में यूनेस्को ने भी गरबा को ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ की सूची में शामिल किया है।

Mukund Lekhni

मुकुंद लेखनी एक स्वतंत्र हिंदी समाचार पत्र एवं न्यूज पोर्टल है, जो देश-दुनिया, उत्तर प्रदेश और स्थानीय स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को तथ्य, निष्पक्षता और जनसरोकार के साथ पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है।

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